आप अपना आत्म-सम्मान स्वयं घटाते हैं। कैसे?

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आत्म-सम्मान अपने मूल्यों, अपनी क्षमताओं, योग्यताओं व आदर्शों के प्रति एक सकारात्मक विश्वास की भावना है। जो हमें एक गौरवमयी, सफल व संतुष्ट जीवन प्रदान करता है।

“आत्म सम्मान स्थिर नहीं होता है।” हम अक्सर नए-नए लोगों से मिलते रहते हैं। उनसे हमारी चर्चाएं होती हैं। शुरुआत में वे हमें पूर्ण सम्मान देते हैं। किंतु समय के साथ उनकी नजरों में हमारा सम्मान घट जाता है। वह हमें पहले जितनी इज्जत नहीं दे पाते हैं। ऐसा क्यों होता है?

आत्म-सम्मान

आत्म-सम्मान का गिरना आपके मन, वचन और कर्मों से लोगों के मन में उत्पन्न नकारात्मक भाव का परिणाम होता है। ये अत्यंत सूक्ष्म प्रभाव होते हैं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

आइए हम उन गतिविधियों को समझने का प्रयास करते हैं। जो आत्मसम्मान को कम करने के लिए जिम्मेदार है।

1. बातचीत-

बातचीत सिर्फ शब्दों का ही आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह आपके मूल्य, भावना, विचार व आदर्शो को भी प्रदर्शित करता है। नकारात्मक वार्ता, निन्दनीय वार्ता, अनुचित वार्ता, जबरदस्ती वार्ता, अनावश्यक वार्ता, अतार्किक वार्ता और अधिक वार्ता, ये सभी बात-चीत के प्रकार होते हैं।

वार्ता के दौरान व्यक्ति सिर्फ आपको सुनता ही नहीं है, बल्कि वह आपको जज करता है। आपकी भावनाओं व विचारों की अपने आदर्शों से तुलना करता है।

आपके जो भी विचार उसके द्वारा मान्य आदर्शों से मेल नहीं खाते। वे आपके बारे में नकारात्मक भाव पैदा करते हैं और आपका आत्मसम्मान नीचे आता है।

इसलिए “हमें कम बोलना चाहिए।” अक्सर यह देखा जाता है कि, जो लोग कम बोलते हैं और तार्किक बात करते हैं। सामान्यतः सभी लोगों की दृष्टि उन्हीं की ओर होती है।

2. मजा ढूंढना-

हंसना सेहत के लिए आवश्यक है परंतु जबरदस्ती या आवश्यक्ता से अधिक हंसना आपकी छवि को धूमिल बनता है। सामान्यत: मनुष्य की यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपने हर कार्य में मजा ढूंढते हैं। जैसे-

  • किसी से बातचीत करते समय हम गंदे जोक्स, नाम बिगड़ना, गालियां देना, गुप्तांगों पर चर्चा, किसी के रंग-रूप का मजाक बनाना आदि।
  • किसी नासमझ, अनजान या भोले-भाले व्यक्ति को गलत सलाह देकर उसके कृत्य पर हंसना।
  • किसी व्यक्ति के कृत्याें उसके व्यवहारों को बताकर हंसना।
आत्म-सम्मान

ये सभी कृत्य हमें क्षणिक सुख तो देते हैं। परन्तु ये हमारी छवि को एक जोकर, बकबक करने वाले की तरह प्रर्दशित करते हैं और लोग हमें उसी की भांति सम्मान देने लगते हैं।

3. दिखावा करना-

अक्सर हम दूसरों को प्रभावित करने के लिए, समाज में उच्चतर स्थान प्राप्त करने के लिए अपनी छवि को श्रेष्ठ और प्रभावशाली दिखाने के लिए दिखावा करते हैं। जैसे-

  • अपनी योग्यता व अनुभव को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना
  • खुद को दूसरों से अधिक योग्य व बेहतर दिखना
  • महंगे कपड़े व गहने पहनना
  • किसी विषय के बारे में अधिक जानकार होने का दावा करना
  • जटिल शब्दों का प्रयोग करना, भले ही आप उसका अर्थ नहीं जानते हो। आदि।

अपने आप को प्रभावशाली दिखाने के लिए लोग ये सब करते हैं। परंतु ध्यान रहे, “दिखावा वह चांदी का मुखौटा है, जो सोने की चमक दिखाने की कोशिश करता है। परंतु अंततः उसकी सच्चाई उजागर हो जाती है।

जब आपकी वास्तविकता लोगों के सामने आती है, तो उनके मन में आपके लिए मक्कार, झूठा व निठल्ले जैसी एक नकारात्मक भावना उत्पन्न होती है। जिससे वह आपका सम्मान करना कम कर देते हैं।

4. फेवर लेना-

छोटा से छोटा या बड़े से बड़ा अपना हर काम हमें स्वयं करना चाहिए। यदि किसी से हम बार-बार मदद लेते हैं या अनावश्यक मदद लेते हैं। तो वह व्यक्ति हमें घर की मुर्गी समझ लेता है और आप तो जानते ही हैं कि, “घर की मुर्गी दाल बराबर” होती है।

वह व्यक्ति जब चाहे आपसे किसी भी काम के लिए कह सकता है और आप उसे करने के लिए बाध्य होगें। उसके लिए आपका आत्म-सम्मान जीरो होगा।

5. दूसरों को सुधारने का प्रयास करना-

कभी-कभी हम दूसरों को नकारा, असभ्य और बिगड़ा हुआ समझकर उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं। जैसे-

  • कुछ लोगों के बारे में हमारी पहले से ही राय होती है कि वह असभ्य और बिगड़ा हुआ है।
  • किसी से बातचीत के दौरान यदि आपके विचार एवं भावनाएं सामने वाले के विचारों एवं भावनाओं से मेल नहीं खाती है तो हम उसे अपनी बात मनवाने के लिए तथ्यों का तर्कों का प्रहार करते हैं।
  • किसी की कोई बात, कृत्य या व्यवहार आपको गलत लगता है तो आप उसे यह महसूस करवाने का प्रयास करते हैं कि वह गलत है।

क्योंकि ऐसी स्थिति में उनकी भावना, आपकी भावना के बिल्कुल विपरीत होती है। इस समय आप जो भी बात कहेंगे, वह उसे अपनी योग्यता व क्षमता पर प्रहार सा प्रतीत होता है। जो उसके मन में एक नकारात्मक भाव को जन्म देता है।

इसलिए जब तक कोई व्यक्ति स्वयं न सुधारना चाहे, तब तक उसे सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यदि इसके बावजूद भी आप करते हो तो शत्रुता होने की संभावना बढ़ती है।

इसके अलावा अत्यधिक व अनावश्यक क्रोध भी आपके आत्म-सम्मान को बढ़ने नही देता।

आप चाहें तो किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को परख सकते हो, जो Life में हमेशा Serious रहते हैं। ऐसे लोगों के पास धन भले ही न हो, परन्तु Self-Respect आवश्यक्ता से अधिक ही होता है।

हमारे लेख को पढ़ने के लिए आपका हृदय की गहराई से बहुत-बहुत धन्यवाद!


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This Post Has 2 Comments

  1. Sachin

    Ha Bhai mere sath esa hi hua hai

  2. Jai

    Thankyou sir

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